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[purple]तुमने प्रकाश की किरणों को जों बाते कह दी है... वह नव सूरज के उजाले मे मुझ तक आ गयी है... सुनहरी मद्दम रौशनी मे, पंछियों के मीठे कलरव मे.. और सुबह की ओस की बूंदों मे.. मे तुम्हे देख कर कह उठता हूँ.. फिर दुपहर की गर्मी मे.....दिन को ओढे काम करता हूँ... और शाम के एकाकी स्वर मे, नए गीतों का अभिनन्दन करता हूँ... फिर उसी रात की काली चादर मे लिपटे...असंख्य तारो मे तेरा नामो निशाँ ढूँढता हूँ.. और फिर मीठी नीद की झपकी का...एहसास अनूठा होता है.. तुम जों हंस पड़ते हों.. तो उपवन हरा हों जाता है.. यह जो तुम्हारा काम है..उसे देख कर मे शीतल हों उठता हूँ.. ये कैसी खुशबू बिखेर दी है...'भगवन' तूने 'आनद' के उपवन मे...![purple]