शब्द जों आंसू बने थे, आज ज़िन्दगी की किताब पर -लुढ़क गए, आँखों के आगे कारवां गुज़रता गया (मुमकिन न था, देख पाना) दो ही शब्द लिखने थे, पर पंक्तियाँ जुड़ती गयी, जुड़ते जुड़ते वो भी जुड़ गए, और एक कहानी बन गयी, वही कहानी उनकी ज़िन्दगी की किताब थी, कारवां बढ़ता जा रहा था, लोग शामिल होते जा रहे थे,' मशालें जली थी, सड़क के किनारे प्रचुर रौशनी चलती थी, आंसुओं की धारा भी अविरल, गालों पर थी...... to be continue!!
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