अपनी मर्ज़ी से कहा अपने सफ़र के हम है... रुख हवाओं का जिधर है, उधर के हम है॥ वक्त के साथ है, मिटटी का सफ़र सदियों से... किसको मालूम कहा के है, किधर के हम है॥ निदाँ फ़ाजली
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टूट गई मुहब्बत, इबादत मेरी देखकर गम -ऐ -ज़िंदगी में , 'कुफ्र' सा भर आया ` जों में समझाना चाहता था , न समझ सका कोई मुक़र्रर कर दिया 'पागल' मुझे 'हिज्र में रोकर , सुबकने लगा में केवल ना आया कोई पोछ्ने आंसू मेरे ! न देखा किसी ने , न पूछा किसी ने ...न दी दिलासा किसी ने , न कोई आया तो , में ही इबादत कर आया 'कब्र ' की अपनी .. जों फूल तुझे चढ़ते थे खुदाया ...चढा आया में कब्र पे अपनी ॥