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खुदाया नूर बरसाया तूने

खुदाया नूर बरसाया तूने , होश तेरे बन्दों को आया , ज़लज़ला सा भर आया था सीने में उनके , ज़हर , गोली , नफरत , आग , तपिश , बंदूके , क्या क्या न झेला उन्होंने .. क्या क्या न मजबूर कराया "आम " आदमी को झेलने के लिए , एक चिंगारी जाना है जन्नत , देखना hai  darwza खुदा ऐ पाक के रहमो करम का , जों न माना किसी ने तो इल्म था यह मोत के घाट उतर दिया तुमने उनको , न पूछा मजहब उसका , न पूछी पहचान उनकी ... क्या मिला इत्तो को मार कर , क्या मिल गया दरवाज़ा जन्नत का ? जों करते इश्क हार इंसा से तो हर दरवाज़ा नोश फरमाता ! इसी आम आदमी की रहमो करम से आबाद है हर दरवाज़ा चैन ओ अमन का आखिर एक ख्वाब तो आया खुदाया नूर बरसाया तूने ...! होश तेरे बन्दों को आया ......!!