ए धुंद ! मेरी बहन धुंदअब में तुम्हारे साथ एक हूँ..
अब में स्व नहीं हूँ..दीवारे डेह गयी और जंजीरे टूट गयी हैं..
धुंद में अब तुझे पहचान चुका हूँ..

और अब हम एक साथ सागर पर लहरायंगे जीवन के दूसरे दिन तक
जब भोर तुम्हे किसी बगीचे में ओस बनकर बिखेरेगी...
और में किसी स्त्री के स्तन पर पड़ा नन्हा शिशु बन जाऊँगा....
उसी मासूमियत के साथ...
और तुम मेरे कदम चूम लोगी

ए धुंद मेरी बहन धुंद....वो मासूमियत फिर लौटेगी....

बाहर मैं कर दिया हूँ......


भीतर पर भर दिया हूँ...

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