टूट गई मुहब्बत, इबादत मेरी देखकर
गम -ऐ -ज़िंदगी में , 'कुफ्र' सा भर आया `
जों में समझाना चाहता था ,
न समझ सका कोई
मुक़र्रर कर दिया 'पागल' मुझे

'हिज्र में रोकर , सुबकने लगा में केवल
ना आया कोई पोछ्ने आंसू मेरे !

न देखा किसी ने , न पूछा किसी ने ...न दी दिलासा किसी ने ,
न कोई आया तो , में ही इबादत कर आया 'कब्र ' की अपनी ..

जों फूल तुझे चढ़ते थे खुदाया ...चढा आया में कब्र पे अपनी ॥

टिप्पणियाँ

एक एक पंक्ति या यूँ कहें हर शब्द में दर्द है
बारीकी है.........बहुत अच्छा लिखा है
बेनामी ने कहा…
Last line is just too good..Beautifully expressed!!

इस ब्लॉग से लोकप्रिय पोस्ट

कुछ खट्टा कुछ मिट्ठा !