मज़हबी रंग..?

# # उसने ज़फा किया था..उसने सजदा किया था..!!
कल वो गया था, मजार पर चढाने फूल
आज क्यों फोड़ आया "बम" मजार के पास मिरी??

# कहाँ तेरी इस काया में बसता हूँ में.?
तू मार देता है जीता जी मुझे जब में होता हूँ माँ के स्तन से लिपटा हुआ..
शायद तेरी इबादत अभी अधूरी है..!!

# रोज़ करता है वो इबादत मेरी
कोई शक नहीं उसकी बंदगी में मुझे..
पर क्यों भूल जाता है वो मुझे जब फोड़ आता है बम भरे बाज़ार में..!!
में तब भी वही होता हूँ.!!

# वो क्या लिख भेजा था ख़त में तुमने अपने
कि मोत् हमारी, आमीन तुम्हारी..!
अब देख लो मोत् का मंज़र अपनी., आँखों से apni ..!!

टिप्पणियाँ

सार्थक रचना है।बधाई।
बेनामी ने कहा…
Emotional write full of pain from a sensitive poet..way to go, arch..

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